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हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन,

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ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक !!

Mirza Asadullah Khan (Ghalib)-27-12-1797(Agra) To 15-02-1869 (Delhi)

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Ghazals Of Ghalib

The Almighty Of Rekhta

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(121)
अब ये भी है क़रीब कि मिट जाएँ यकक़लम ,
सीने में दाग़ जितने ग़म-ए-दिलबरां के हैं !(मोहानी)

 

(122)
किसीने उसको समझाया तो होता ,
कोई यां तक उसे लाया तो होता !(ज़फर)


(123)
जितनी भी हुई 'ताबिश' युरिश ग़म-ए-हस्ती की ,
उतनी ही निखर आई एहसास की रानाई !(ताबिश)


(124)
जो रंग भर दो उसी रंग में नज़र आये ,
ये ज़िन्दगी न हुई,कांच का गिलास हुआ !(कबीर)


(125)
हुदूद-ए-रक़्श से आगे निकल गई थी कभी ,
सो मोरनी की तरह उम्र भर को रांद हुई !(परवीन)


(126)
न पैमाने खनकते हैं न दौर-ए-जाम चलता है ,
नै दुनिया के रिंदों में खुदा का नाम चलता है !(शकील)


(127)
परी की जुल्फों में उलझा,या रीश-ए-वाइज़ में ,
दिल-ए-ग़रीब हुआ लुक़्मा इम्तिहानों का !(अकबर)


(128)
मैं जो कहता हूँ कि हम लेंगे क़यामत में तुम्हे ,
किस रुऊनत से वो कहते हैं कि हम हूर नहीं !(ग़ालिब)


(129)
रूक्का चोरी से उसे भेजा है अनजान के हाथ ,
कैसी रूसवाई है,पड़ जाये जो दरबान के हाथ !(ज़ौक़)


(130)
न चाहो दिखाना जो तुम रू-ए-ज़ेबा ,
दिया ही जलाकर लैब-ए-बाम रख दो !(क़तील)


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